जाड़े का मौसम और गुनगुनी धुप थी,
छुट्टी का दिन था और अभी तक बीवी भी चुप थी.
छत पे आराम से अखबार के साथ चाय के मजे ले रहा था,
और एक जिम्मेवार नागरिक की तरह नेताओं को गालियाँ दे रहा था.
तभी पत्नी की आवाज आई,
मानो रेल ने सिटी बजायी,
अजी सुनते हो “दिन भर अख़बार हीं पढोगे या राशन भी लाना है”
मैंने कहा “पता है भाग्यवान क्यूंकि आज खाना तो मुझी को पकाना है”.
पत्नी के दिमाग पे आजकल नारीवाद का भूत सवार है,
समानता के नाम पर पति पे ये कैसा अत्याचार है.
भीगी बिल्ली बना हूँ बीवी के डर से,
हे ऊपर वाले, तेरी लीला अपरम्पार है.
खैर, अनमने ढंग से मैंने झोला उठाया,
मन ही मन में बीवी पे गुर्राया,
उस पंडित को कोसा जिसने शादी रचाया,
किस मनहूस घडी में था मुझको फंसाया.
गलती(शादी) जो की थी कुछ साल पहले,
आज तक उसकी installment चूका रहा हूँ.
शादी का लड्डू था खाने में मीठा,
लेकिन साहब बहुत पछता रहा हूँ.
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