Wednesday, 19 October 2016

पत्नी पीड़ित पति

जाड़े का मौसम और गुनगुनी धुप थी,
छुट्टी का दिन था और अभी तक बीवी भी चुप थी.
छत पे आराम से अखबार के साथ चाय के मजे ले रहा था,
और एक जिम्मेवार नागरिक की तरह नेताओं को गालियाँ दे रहा था.

तभी पत्नी की आवाज आई,
मानो रेल ने सिटी बजायी,
अजी सुनते हो “दिन भर अख़बार हीं पढोगे या राशन भी लाना है”
मैंने कहा “पता है भाग्यवान क्यूंकि आज खाना तो मुझी को पकाना है”.

पत्नी के दिमाग पे आजकल नारीवाद का भूत सवार है,
समानता के नाम पर पति पे ये कैसा अत्याचार है.
भीगी बिल्ली बना हूँ बीवी के डर से,
हे ऊपर वाले, तेरी लीला अपरम्पार है.

खैर, अनमने ढंग से मैंने झोला उठाया,
मन ही मन में बीवी पे गुर्राया,
उस पंडित को कोसा जिसने शादी रचाया,
किस मनहूस घडी में था मुझको फंसाया.

गलती(शादी) जो की थी कुछ साल पहले,
आज तक उसकी installment चूका रहा हूँ.
शादी का लड्डू था खाने में मीठा,
लेकिन साहब बहुत पछता रहा हूँ.

Saturday, 2 July 2016

"जिंदगी घड़ी सी हो गयी है"

जिंदगी घड़ी सी हो गयी है,
चलती है, पर ठहरी सी हो गयी है,
कहने को चक्कर हर बार लगाती है,
जाती नहीं कहीं, पर चलती जाती है।

कट रही है जिंदगी, पर खुशबु जैसे खो गयी है।
बीत रहा है वक़्त, पर हंसी मानो रो रही है।
कैलेंडर भी बदल रहा तारीखें,
धूल उसपे भी थोड़ी जमी सी हो गयी है।

जिंदगी घड़ी सी हो गयी है,
चलती है पर रुकी सी हो गयी है।

"नारीशक्ति"

नारी तू महान है, कितने रूपों में जानी जाती,
कभी माँ, कभी बहन, कभी पत्नी, कभी बेटी कहलाती,
जितने भी हों तेरे रूप, हर रूपों में कर्तव्य निभाती,
ऐसे किये तुमने हैं काम, जिससे सारी दुनिया थर्राती।

अत्याचार सहे हैं तुमने, वो बातें अब खलती हैं,
रामायण में सीता माँ भी अग्नि में जलती हैं,
पांडव के हीं सामने द्रौपदी का होता चीरहरण,
अहल्या को भी रहना पड़ा कई वर्षों तक पत्थर बन।

फिर भी अत्याचारों से तुम कहाँ रुकने वाली थी,
महिषासुर का मर्दन करने वाली माँ शेरावाली थी,
अंग्रेजों को धूल चटा के वीरगति को पायी थी,
मर्दानी वो जानी मानी रानी लक्ष्मीबाई थी।

मदर टेरेसा बनकर बीमारों को जीवनदीप दिया,
मीराबाई ने कृष्ण की भक्ति में है विष पिया,
कल्पना और सुनीता ने भारत का रौशन नाम किया,
इंदिरा गांधी ने भारत को नया जनमार्ग दिया।

पी टी उषा, किरण बेदी, मैरी कॉम, लता दीदी,
सबने मिलकर हिन्द के सर पे रखा ताज है,
अगणित महिआओं ने भारत का है मान बढ़ाया,
हिंदुस्तान को अपनी नारीशक्ति पे नाज है।।

"द्रविड़- द वॉल"

"गेंदबाजों के छुड़ा के छक्के,
लोग रह गये हक्के बक्के,
घुमा के बल्ला लगा के चौका,
नहीं किसी को दिया है मौका.
मैदान के पार गयी है,
गेंद बेचारी हार गयी है,
गेंदबाज के आँख के पानी,
याद आ गयी उसको नानी.
त्राहिमाम मचा हुआ गेंदबाज के खेमे में,
सारे प्रयास विफल हुए इसको पगबाधा करने में,
ना तो बोल्ड, ना कैच, ना रन आउट हीं कर पाया,
कौन है ये भाई कौन है ये,
ना जाने क्या खा कर आया.
(तभी आकाशवाणी होती है.)
सूर्य चमकता जैसे हरदम, वैसे करता ये कमाल है,
बल्लेबाजी का शहंशाह, विकेटकीपिंग भी बवाल है,
क्रिकेट का है कोहिनूर, भारत का चहेता लाल है,
नाम है राहुल शरद द्रविड़, प्यार से कहते The Wall हैं."

"तू"

तू मेरी कविता है, तू हीं मेरी रचना,
तू मेरी प्रेरणा, तू हीं मेरा सपना।
तू दिन, तू रात, तू सुबह, तू शाम,
तू हीं पराया है, तू हीं मेरा अपना।

तू पहाड़ों की धुंध है, तू झरनों का संगीत,
तू नदिया की धारा जैसे गाती कोई गीत।
तू सुर, तू लय, तू मय, तू जाम,
तुझसे हीं आगाज़ है, तुझपे हीं अंजाम।

तू बांसुरी की राग है, तू कोयलों की कूक,
तू रौशनी है चाँद की, तू सूर्योदय की धूप।
तू दर-बदर, हर गाँव, हर शहर,
जैसे फैली है फ़िज़ा में तेरी खुशबु की लहर।

तू शामिल है कण-कण में,
मेरे मन में, मेरे तन में, जीवन में।
तुम आ के भर दो खुशियाँ,
मेरे सूने उपवन में।

"कविता की परिभाषा"

हमारे एक वरिष्ट अधिकारी ने एक भोज के दौरान हमसे पूछा
"केशरी जी, सुना है आप कवितायें लिखते हैं,
ये रोग कैसे लगा आपको
आप तो अच्छे-खासे दिखते हैं"।

मैंने कहा "सर आप जैसे
महानुभावों से ही थोड़ी-बहुत सीख लेता हूँ,
जब कभी दिल में आता है
मैं भी टूटी-फूटी लिख लेता हूँ"।

उन्होंने कहा "अच्छा, यदि छपी हो कोई रचना
किसी अखबार में तो हमें भी बताओ,
क्या होती है कविता की परिभाषा
जरा विस्तार से समझाओ"।

मैंने कहा "सर, कविता
किसी परिभाषा की मोहताज नहीं है,
माफ़ कीजियेगा आपके सवाल का
जवाब मेरे पास आज नहीं है"।

इसके बाद उन्होंने मुझे
अच्छे से कविता का मतलब बतलाया,
ये अलग बात है मेरे बिलकुल
समझ में कुछ ना आया।

इतने में लग गयी हम दोनों की थाली
भोजन को देख के छा गयी मेरे चेहरे पे लाली,
मैंने कहा "सर, मटर-पनीर खाओ
क्योंकि मेरी भूख तो जाग रही है,
कविता पर चर्चा कभी और कर लेंगे
वो बेचारी कहाँ भाग रही है"।

"ख़ामोशी"

आँखों से अपने कुछ कहती हो तुम,
पर लफ्ज़ तुम्हारे वो कह नहीँ पाते।
इशारों में शायद बताती हो तुम,
पर होठ तुम्हारे क्यों खुल नहीं पाते।
मैं भी हूँ जट, समझता हीं नहीं,
और तुम हो की बता नहीं पाते।
ऐसी ख़ामोशी रहेगी कबतक,
न मैं समझता, और तुम समझा नहीं पाते।