Saturday, 2 July 2016

"कविता की परिभाषा"

हमारे एक वरिष्ट अधिकारी ने एक भोज के दौरान हमसे पूछा
"केशरी जी, सुना है आप कवितायें लिखते हैं,
ये रोग कैसे लगा आपको
आप तो अच्छे-खासे दिखते हैं"।

मैंने कहा "सर आप जैसे
महानुभावों से ही थोड़ी-बहुत सीख लेता हूँ,
जब कभी दिल में आता है
मैं भी टूटी-फूटी लिख लेता हूँ"।

उन्होंने कहा "अच्छा, यदि छपी हो कोई रचना
किसी अखबार में तो हमें भी बताओ,
क्या होती है कविता की परिभाषा
जरा विस्तार से समझाओ"।

मैंने कहा "सर, कविता
किसी परिभाषा की मोहताज नहीं है,
माफ़ कीजियेगा आपके सवाल का
जवाब मेरे पास आज नहीं है"।

इसके बाद उन्होंने मुझे
अच्छे से कविता का मतलब बतलाया,
ये अलग बात है मेरे बिलकुल
समझ में कुछ ना आया।

इतने में लग गयी हम दोनों की थाली
भोजन को देख के छा गयी मेरे चेहरे पे लाली,
मैंने कहा "सर, मटर-पनीर खाओ
क्योंकि मेरी भूख तो जाग रही है,
कविता पर चर्चा कभी और कर लेंगे
वो बेचारी कहाँ भाग रही है"।

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